खामोश मोहब्बत और अधूरे ख्वाब: Deep Sad Shayari In Hindi
जब दिल का दर्द लफ्ज़ों में ढल जाता है, तो वो शायरी बन जाता है। यहाँ प्रस्तुत हैं दिल को छू लेने वाली बेहद उदास शायरियां, जिन्हें आप सीधे एक क्लिक में डाउनलोड या शेयर कर सकते हैं।
बिछड़ कर उसका दिल भी लग गया होगा कहीं अब तक,
वो मेरे जैसा तन्हा हो, ये मुमकिन तो नहीं लगता।
बिसात-ए-इश्क़ पर बाज़ी पलट जाती है पल भर में,
जिसे हम ज़िंदगी समझे, वो अब अपना नहीं लगता।
तुम्हारी याद के साए से डरने लग गया हूँ मैं,
ज़माने की जफ़ाओं से मुकरने लग गया हूँ मैं।
कभी जो रौशनी बनकर मेरी राहों में हँसते थे,
उन्हीं चिरागों की सोहबत में जलने लग गया हूँ मैं।
किताबों में छुपा कर रखे वो सूखे हुए पत्ते,
तुम्हारी बेरुखी का आज भी साया दिखाते हैं।
जिन्हें हम भूलने की रात-दिन कोशिश में रहते हैं,
वही चेहरे ख़यालों में मुसलसल लौट आते हैं।
बहुत मसरूफ़ रहते हैं वो अब गैरों की महफ़िल में,
हमारे वास्ते शायद कोई लम्हा नहीं बचता।
मकान-ए-दिल की दीवारें ढहने लगी हैं धीरे-धीरे,
कि अब इस शहर में कोई भी अपना नहीं दिखता।
अजीब कशमकश में कट रही है ज़िंदगी अपनी,
न तुमको पा सके वापस, न तुमको भूल पाते हैं।
मोहब्बत की तड़प क्या है कोई पूछे उस दिल से,
जो हँसता है ज़माने में, मगर आँसू छुपाते हैं।
चले आएँगे हम भी एक दिन खामोशियों की ज़द में,
फिर हमारी याद में तुम अश्क़ मत बहाना।
मिले जो राह में तो फेर लेना अपनी ये आँखें,
मगर गुजरे हुए लम्हों को झूठा मत बताना।
नसीबों का लिखा कहकर जुदा जो हो गए हो तुम,
ये समझाओ कि इस दिल को सुकूँ कैसे मिलेगा अब।
बहारें लौट कर आईं मगर पतझड़ रहा दिल में,
जो गुलशन ही उजड़ जाए तो उसमें क्या खिलेगा अब।
हज़ारों महफ़िलें हैं और लाखों कद्रदान हैं इसके,
मगर इस दिल को तेरी एक खामोशी रुलाती है।
दिखावे की हँसी हँसकर थक चुका है वजूद मेरा,
सुलगती रात में बस तेरी परछाईं सताती है।
कभी फुर्सत मिले तो दर्द की गहराई को पढ़ना,
जो हम कह न सके तुमसे, वो इन पन्नों में बिखरा है।
तुम्हें तो मिल गए साथी नए इस दौर-ए-सफ़र में,
मगर मेरा सफ़र तो आज भी वहीं पर ठहरा है।
गिला किससे करें जब खुद ही रास्ता चुना हमनें,
मोहब्बत का सफ़र वैसे भी आसान नहीं होता।
दिए जो ज़ख्म तुमने हँस के सह लिए सारे,
मगर इस दर्द का कोई भी दरमान नहीं होता।
सजाये थे जो सपने वो धुएँ में उड़ गए सारे,
उम्मीदों के महल पल भर में देखो ढह गए सारे।
भरोसा किस पे करें इस बदलती हुई दुनिया में,
जिन्हें रहबर बनाया था, वही तन्हा छोड़ गए सारे।
अंधेरी रात के साए में रोता है दिल चुपके से,
कि सुबह होते ही फिर मुस्कुराना पड़ता है।
कोई समझे न समझे इस अकेलेपन की तकलीफ़ को,
ज़माने के लिए हर ग़म छुपाना पड़ता है।
चलो अब ख़त्म करते हैं ये यादों का सिलसिला भी,
न तुम आवाज़ देना, न हम मुड़ कर देखेंगे।
सफ़र इस इश्क़ का मुकाम-ए-आख़िर पर आ पहुँचा,
अब अपनी राख को हम खुद ही हवाओं में बिखेरेंगे।